सतनामी समाज, सतनाम पंथ, गुरु घासीदास, सतनाम धाम और परंपराओं से जुड़े सामान्य प्रश्नों के उत्तर।
सतनामी समाज छत्तीसगढ़ में निवास करने वाला एक सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय है जो सतनाम पंथ को मानता है। इसकी स्थापना संत गुरु घासीदास जी ने 18वीं शताब्दी में की थी। यह समाज जाति-विहीन, वर्ण-विहीन समता, बंधुत्व और सत्य पर आधारित जीवन शैली का पक्षधर है।
सतनाम पंथ संत गुरु घासीदास जी द्वारा स्थापित एक आध्यात्मिक-सामाजिक मार्ग है जिसका मूल मंत्र "सतनाम" (सत्य का नाम) है। इसके सात सिद्धांत (सप्त सिद्धांत) हैं: सतनाम पर विश्वास, मूर्ति पूजा निषेध, जाति भेद निषेध, जीव हत्या/मांसाहार निषेध, नशा निषेध, परस्त्री को माता मानना, गाय को हल में न जोतना।
संत गुरु घासीदास बाबा जी (1756-1861) सतनाम पंथ के संस्थापक और सतनामी समाज के आदि गुरु हैं। उनका जन्म गिरौदपुरी, छत्तीसगढ़ में हुआ था। उन्होंने समाज में व्याप्त कुप्रथाओं (छुआछूत, जाति भेद, पशुबलि, नशा, सती प्रथा) का विरोध किया और "मनखे मनखे एक बरोबर" का संदेश दिया।
गुरु घासीदास जयंती प्रतिवर्ष 18 दिसंबर को मनाई जाती है (भादो कृष्ण पक्ष अष्टमी, 1756 को उनका जन्म हुआ था)। इस अवसर पर पूरे छत्तीसगढ़ में माह भर मेले, रावटी, पंथी नृत्य, भजन-कीर्तन और गुरुदर्शन मेला का आयोजन होता है।
प्रमुख सतनाम धाम: 1) गिरौदपुरी धाम (गुरु घासीदास की जन्मस्थली), 2) भंडारपुरी धाम (मोती महल, गुरु गद्दी), 3) चेतवापुरी धाम, 4) तेलासी भंडार/भण्डारपुरी, 5) रावटी स्थल (विभिन्न गांवों में)। इन सभी स्थानों पर जैतखाम (सफेद खंभा) स्थापित है।
रावटी सतनामी समाज का वार्षिक धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन है जो गांव-गांव में होता है। इसमें पंथी नृत्य, मंगल गीत, चौंका-आरती, गुरु महिमा का गुणगान और सामाजिक चर्चा होती है। रावटी वर्षचर्या (कैलेंडर) के अनुसार अलग-अलग तिथियों पर विभिन्न गांवों में आयोजित की जाती है।
गुरु घासीदास जी के बाद उनके पुत्र गुरु अमरदास जी (आध्यात्मिक गुरु) और राजा गुरु बालकदास जी (सामाजिक-राजनैतिक गुरु) ने गुरु परंपरा चलाई। वर्तमान में गुरुवंश (गुरु परिवार) के सदस्यगण गुरु गद्दी संभालते हैं। प्रमुख गुरुजनों में: गुरु ढालदास, गुरु सोमेश, गुरु खुशवंत, गुरु सौरभ, गुरु नशी, गुरु विजय, गुरु रुद्र, गुरु रीपुदमन, गुरु आसनदास, गुरु मुक्तिदास, गुरु शक्तिदास, गुरु फलदास, गुरु मनहरण दास आदि शामिल हैं।
जैतखाम (जय स्तंभ) सतनाम पंथ का प्रतीक है - एक सफेद रंग का खंभा जिस पर "सतनाम" लिखा होता है। यह गुरु घासीदास जी के "मनखे मनखे एक बरोबर" संदेश का प्रतीक है। हर सतनामी घर, गांव और धाम में जैतखाम स्थापित किया जाता है। यह सत्य, अहिंसा, समता और भाईचारे का प्रतीक है।
सतनामी समाज में विवाह सादगी से, बिना दहेज, बिना पंडित-पुरोहित के गुरु के सान्निध्य में होता है। दूल्हे को सोने का जनेऊ (कंठी) पहनाया जाता है। पंगत (सामूहिक भोज), चौंका-आरती, नाम-पान (दीक्षा) प्रमुख संस्कार हैं। समाज में विधवा पुनर्विवाह की परंपरा गुरु घासीदास जी के समय से ही है।
गुरुदर्शन मेला भंडारपुरी धाम में प्रतिवर्ष क्वाँर शुक्ल पक्ष एकादशी को आयोजित होता है। इसकी शुरुआत राजा गुरु बालकदास जी को अंग्रेजों द्वारा राजा की उपाधि मिलने की खुशी में गुरु घासीदास जी ने की थी। इसमें गुरुवंश हाथी-घोड़े पर सवार होकर अखाड़ा-तलवार के साथ निकलते हैं। हजारों श्रद्धालु दर्शन लाभ लेते हैं।
सतनामी समाज का इतिहास मौखिक परंपरा, गुरु ग्रंथों (अमृतवाणी, सप्त सिद्धांत), ब्रिटिश राजस्व अभिलेखों, छत्तीसगढ़ के राजपत्रों, और वरिष्ठ जनों के साक्षात्कार पर आधारित है। गुरुवंशज वेबसाइट (guruvanshaj.com) पर गुरु परिचय, धाम, रावटी, इतिहास और समाचार उपलब्ध हैं।
नाम-पान (दीक्षा) गुरु या अधिकृत महंत/भंडारी से ली जाती है। इसमें "सतनाम" मंत्र का जाप, चंदन तिलक, कंठी माला धारण, सततागी (जनेऊ) पहनना और सप्त सिद्धांतों का पालन करने का संकल्प शामिल है। दीक्षा के बाद व्यक्ति सतनामी कहलाता है और जाति-पाति से मुक्त माना जाता है।
आप गुरुवंशज वेबसाइट के संपर्क पृष्ठ के माध्यम से जुड़ सकते हैं। ईमेल: guruvanshaj7@gmail.com, फोन: +91-93991-35179। आप अपने गांव की रावटी तिथि, धाम की जानकारी, पुराने चित्र/दस्तावेज, गुरु कथाएं साझा कर सकते हैं। आर्थिक सहयोग के लिए गुरुद्वारा भंडारपुरी धाम से संपर्क करें।
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